अकेले चलते जा रहे है ...

अकेले चलते जा रहे है ...

अकेले चलते जा रहे है ,
बस अकेले चलते जा रहे है।

ना  सामने कुछ दिखता है ,
ना पीछे किसी की छाया है।

सब मुझको पराये लगते है ,
मैं खुदको परायी लगती हूँ।

इतना सोच चूकी हूँ  मैं ,
की अब सोचने से डर लगता है।

इतना सह चूकी हूँ  ,
की अब सहने से दिल धड़कता है।

सच में कितने बंधनों में जीता है मानव ,
इसका कोई व्याप नहीं।

कब होगा नया सवेरा ,
इसका कोई जवाब नहीं।

यूँ बंदिशों के घेरों में ,
खुद को अकेली पाती हूँ ।

मैं रोज अपने सपनों में ,
सपनों को छोड़ आती हूँ 

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अजिंठा . . .

  अजिंठा . . .  अजिंठा, तसाच हतबल, अबोल, तितकाच कठोर दिसणारा पण मनाने तितकाच मृदु, तितकाच देखणा, तितकाच अनुभवी, तितकाच पूर्ण व तितकाच अतृप्त...