अकेले चलते जा रहे है ...
अकेले चलते जा रहे है ,बस अकेले चलते जा रहे है।
ना सामने कुछ दिखता है ,
ना पीछे किसी की छाया है।
सब मुझको पराये लगते है ,
मैं खुदको परायी लगती हूँ।
इतना सोच चूकी हूँ मैं ,
की अब सोचने से डर लगता है।
इतना सह चूकी हूँ ,
की अब सहने से दिल धड़कता है।
सच में कितने बंधनों में जीता है मानव ,
इसका कोई व्याप नहीं।
कब होगा नया सवेरा ,
इसका कोई जवाब नहीं।
यूँ बंदिशों के घेरों में ,
खुद को अकेली पाती हूँ ।
मैं रोज अपने सपनों में ,
सपनों को छोड़ आती हूँ
Osm poem man
ReplyDeleteअप्रतिम सुंदर कविता👌👌
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