ज़िंदगी ?
के अब बस कोई सजा न दो ,
जीने के और कोई वज़ह न दो।
के अब हमे और कुछ देखना नहीं है ,
जीने के नाम मरना नहीं है।
यूँ तो जीने पर बेहद हसीं नग़में बने है ,
पर सच पूछती हु , क्या वो थोड़े भी अपने लिए है ?
जीने के बारे में जो सपनें ख़िले देखे थे ,
सच में तो बस हमे सदमे मिले है।
यूँ तो कभी शिकवा किया नही तुझसे , ऐ ज़िंदगी ,
पर क्या तू हमारी शिकायत की राह देखती रही ?
यूँ तो हारने वालों में हम भी नहीं है ,
पर क्यों तू इम्तेहान लेती रही।
जो इतने बुरे लगते है हम ,
तो सुनो , दुनियाँ देखने का शौक़ हमे था भी नही।
जो इतना तड़पाना चाहती थी ,
तो तेरे मोहताज हम कभी थे भी नही।
Very nice composition ma'am...
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