और क्या कहे इस दुनिया का ...
और क्या कहे इस दुनिया का,
इसका तो कोई जवाब नही ।
जो काम के हो तो याद करे,
वरना तुम कोई कमाल नही ।
और क्या कहे इन लोगों का,
ये फ़ायदे से हि आते है ।
फ़ायदे से ही सवारे तुम्हे,
फ़ायदे से ही जलाते है ।
जब हो तुम्हारे दिन अच्छे,
तो तुम्हे ये पूजते है,
और ना हो अगर पास कुछ भी,
तब भी कहा छोडते है।
तुम हो अच्छे, तुम हो बुरे,
ये तुम्हे नोंच ही खाते है।
यह इनकी बनाई नगरी है,
ये कहाँ किसी को छूट देते है।
तुम जिंदा हो ऐसे किचड मे,
जहाँ कमल नही खिल सकते है।
ये किचड तो वो किचड है,
जहाँ अपने ही नही मिलते साहब।
ये डराते धमकाते है,
अपनी बनाई व्यवस्था मे रहना सिखाते है ।
ये नोचते खा जाते है,
ये तुम्हे जिन्दा कहाँ छोडते है ।
तुम तो बस एक हाड-मांस का पुतला हो,
जो बना ही इनके लिये है शायद ।
ये जिंदगी वैसे तो तुम्हारी है,
पर सुच बताना, क्या तुम खुद के मालिक हो ।
ये दुनिया बेहद अजीब है,
जो हाल तो जानती है पर फिर भी तमाशा देखती है।
ये लोग बडे बेगाने से है,
अपना कहकर तुम्हे बिच रास्ते छोड देते है ।
इनको बस अपनी बनाई व्यवस्था की पडी है,
जो तो कई बरसों से सड़ी पडी है।
ये सब जो है, सब स्वार्थी है,
ना जाने क्यों अपना होने का ढ़ोंग करते है।
तुम कैसे सोच सकते हो,
तुम्हारी मर्जी के बारे मे,
ऐसी जगह पर साहब,
जहाँ ना तुम्हारा आना तुम्हारे हाथ मे है,
ना यहाँ से जाना ।
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