इंटरनेट के ज़माने में...

इंटरनेट के ज़माने में... 

बचपन गुम गया साहब ,
इंटरनेट के ज़माने में। 
किताबों से दूर हो गए साहब ,
इंटरनेट के ज़माने में। 

कहाँ गया वह घर गोकुल जैसा ,
कहाँ गया वह आँगन ,
अब तो सहमें हुए एक कमरे मे रहते है ,
इंटरनेट के ज़माने में। 

कहाँ गए वह बच्चों के खेल ,
कहाँ गए वह फुरसत के दिन और रैन ,
अब तो अकेले रहते है साहब ,
इंटरनेट के ज़माने में। 

अब तो सबसे दूर हो चुके ,
अब तो खुद से दूर हो चुके ,
जाने कब चैन पाऐंगे ,
इंटरनेट के ज़माने में। 

No comments:

Post a Comment

अजिंठा . . .

  अजिंठा . . .  अजिंठा, तसाच हतबल, अबोल, तितकाच कठोर दिसणारा पण मनाने तितकाच मृदु, तितकाच देखणा, तितकाच अनुभवी, तितकाच पूर्ण व तितकाच अतृप्त...