कॉलेज की यादें ...

कॉलेज की यादें ... 


आज कॉलेज की तरफ काम से जाना हुआ ,

और अपने कॉलेज के दिनों की याद आ गई ।  

ऑफिस की तरफ मुड़ने से पहले जब सामने वाली कैंटीन में बैठे जोश को देखा ,

तो भूली बिसरी यादों ने होश गवाँ दिए। 

ऐसे ही खुद के धुंद में रहते थे हम सब ,

ऐसे ही अपने मगन में जीते थे हम सब। 

वो हर मौसम की चाय ,

वो दोस्तों के तरह हमेशा साथ निभाने वाले बिस्कुट। 

वो मस्ती, वो बदमाशी , 

वो एक दूसरे को उतना ही तंग करना ,

पर समय आने पर बिन बताये ही जान देना ,

वो लेक्चर्स के बाद की थकावट भगाने वाली चाय ,

वो लेक्चर बंक करने पर भी पी जाने वाली चाय ,

वो लाइब्रेरी में पढाई के बीच ली जाने वाली चाय ,

वो एग्जाम के बाद की सुकुन भरी चाय ,

वो अच्छे मार्क्स मिलने पर ली जाने वाली चाय ,

वो बुरे वक्त में दोस्तों का हौसला बढ़ाने वाली चाय। 

आज भी वो कैंटीन वैसी की वैसी है ,

और वो चाय भी वैसी ही बनती है ,

पर पता नहीं, जो स्वाद उन दिनों  में इसमे हुआ करता था ,

आज मानो गायब  हुआ सा लगता है। 

वैसे यहाँ कुछ बदला नही है ,

पर जो बदले है वो दिन है, हम है और हमारी उम्र शायद। 

क्योंकि आज भी वहाँ कोई खुल के हँस रहा था ,

जहाँ एक वक्त हम भी खुलकर हँसा करते थे। 

क्योंकि वहाँ आज भी कोई खुलकर जी रहा था ,

जहाँ एक वक्त हम भी खुलकर जिया करते थे ... 

जिंदगी की राह ...

पता नही कहाँ जा रहे है,

बस हम तो यूँ ही जिंदगी मे आगे चलते  जा रहे है। 

पता नही की, मंजिल और कहाँ है,

या जहाँ हम है वही मंज़िल है। 

माना के देख नही सकते के आगे क्या होगा,

पर यह भी तो तय नही कर पा रहे है,

के कब तक चलते जाना है।  

शायद इसी को जिंदगी कहते है,

जिसमे कोई एक ठिकाना ना हो,

मुकाम तो एक है कही  ,

पर मानो रास्ते बहुत हो। 

और इन रास्तों के बीच जिंदगी हमे ले जा रही है,

अपना तजुर्बा मानो खुद देती जा रही है। 

बड़ा ही दिलचस्प तरीका है जिंदगी का,

खुद के बारे मे सिखाने का। 

बड़ा ही अजीब सलीका है जिंदगी का,

खुद को दिखाने का। 

पर कुछ भी कहिये,

जितना जिंदगी सिखाती है,

किसी भी दक्षिणा की अपेक्षा न रखते हुए,

यकिन मानिये,

कोई क्या ही सिखा पाएगा। 

जितना सच्चा अनुभव यह देती है,

चाहे कैसा भी क्यों ना हो,

कोई क्या ही दे पायेगा। 


रात ...

 आज फिर से रात आ गई,

हमको हमारी औकात बता गई ... 

ए जिंदगी ...

दिल को मेरे अच्छी तरह से समझा दिया मैंने ,

ए जिंदगी, तुझको आज फिर किस्मत पर छोड दिया मैंने ...



पितृदिन ...

 ज्यांच्‍यामुळे आज आपले status आहे, त्यांचे उपकार नुसतेच status ठेवून कसे फेडणार ...

बारिश की बुंदे ...

ये बारिश की बुंदे,

ये माटी की खुशबू,

यूँ ख्वाब दिखाते है कोई,,

ये ठंडी हवाएँ ,

ये महकी फिजाएँ,

यूँ राह दिखाते है कोई,

बस यही तो है,

जो सतरंगी बनकर छाते है| 

रोजमर्रा घुटी सी जिंदगी को,

जो साँस लेना सिखाते है| 

बस यही तो है,

जो हम रिझाते है| 

जो भी हो मैल दिल मे,

ये साफ कर जाते है| 

ये वो है,

जो बताते है,

के मानो कितनी भी धूप क्यो न न हो जिंदगी मे,

एक दिन आकर बारिश सब ठीक कर देगी| 

और हाँ,

शायद तरसाए बहुत ये,

पर एक ना एक दिन जरूर बरसेगी,

मानो रूठी किस्मत हो चमके जैसे ... 


तकदीर ...

 गर हो लिखा तकदीर मे तो जाएगा कहां ...

और गर ना हो तकदीर मे तो मिलेगा कहां ...

अजिंठा . . .

  अजिंठा . . .  अजिंठा, तसाच हतबल, अबोल, तितकाच कठोर दिसणारा पण मनाने तितकाच मृदु, तितकाच देखणा, तितकाच अनुभवी, तितकाच पूर्ण व तितकाच अतृप्त...