खिड़की ...

बस मे खिड़की के पास बैठना मुझे बहुत अच्छा लगता है ,

जैसे मानो दो दुनिया को बाँधनेवाले एक माध्यम का काम ये खिड़की करती हो ,

के एक दुनिया जो बाहर की है जिससे हम जुड़ना चाहते हो भी और नही भी ,

फिर इसे हम देख सकते है , महसूस कर सकते है , जी सकते है ,

और उतना ही दूर भी रह सकते है ,

के मानो दोनों दुनियाँ में कोई रिश्ता सा हो ,

या फिर कोई पहचान भी हो नही ,

के मानो किसी की राह हम देख आगे जा रहे हो ,

या फिर किसी को सदा के लिए अलविदा कह रहे हो ,

के मानो बाहरी दुनिया में हम बसे हो ,

के मानो तो हम उनका हिस्सा हो ही नही ,

के मानो हम कही रुकना चाहते हो ,

के मानो हमे कही  रुकना हो ही नही ,

के मानो भीड़ में से कोई हमे आवाज दे  रहा हो ,

के मानो यहाँ कोई हमे जाननेवाला हो ही नही ,

के अजीब कश्मकश रहती है सब देख दिल मे ,

के हम इनमें से एक हो या फिर हम इनका हिस्सा हो ही नही। 




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