बस मे खिड़की के पास बैठना मुझे बहुत अच्छा लगता है ,
जैसे मानो दो दुनिया को बाँधनेवाले एक माध्यम का काम ये खिड़की करती हो ,
के एक दुनिया जो बाहर की है जिससे हम जुड़ना चाहते हो भी और नही भी ,
फिर इसे हम देख सकते है , महसूस कर सकते है , जी सकते है ,
और उतना ही दूर भी रह सकते है ,
के मानो दोनों दुनियाँ में कोई रिश्ता सा हो ,
या फिर कोई पहचान भी हो नही ,
के मानो किसी की राह हम देख आगे जा रहे हो ,
या फिर किसी को सदा के लिए अलविदा कह रहे हो ,
के मानो बाहरी दुनिया में हम बसे हो ,
के मानो तो हम उनका हिस्सा हो ही नही ,
के मानो हम कही रुकना चाहते हो ,
के मानो हमे कही रुकना हो ही नही ,
के मानो भीड़ में से कोई हमे आवाज दे रहा हो ,
के मानो यहाँ कोई हमे जाननेवाला हो ही नही ,
के अजीब कश्मकश रहती है सब देख दिल मे ,
के हम इनमें से एक हो या फिर हम इनका हिस्सा हो ही नही।